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कृष्ण

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  कृष्ण हे बृजराज  नन्दकुमार , मोर मुकुटिया साजे रे  ग्वालन के संग गैंया चरायो, गोपी संग रास रचायो रे  मटकी फोड़ माखन चुरायो , नाग पे नाच दिखायो रे  हे गिरिधर नागर जिस गिरी को छत्र बनायो  मैं भी उस गोवर्धन नीचे आनंदमयी हो जायूँ रे  जमुना किनारे और रिमझिम सा सावन  वृंत कदम्ब सी छाया, शांत सा मधुबन  मोरपखा कान्हा की बंसी सुरीली  गोपियाँ राधा संग-संग रास रचाये  मानो पाया हो प्रेम, जिसे उद्धव न पाए रणभूमि और परिस्थिति विकट, अर्जुन न शस्त्र उठाते थे  मधुसूदन ने गीता पाठ किया, धर्म कर्म बखान किया  विकराल रूप दिखा प्रभु ने, जैसे ही शंख नाद किया  मानो पल-पल में प्रलय हुआ , धरती फटी अंगारे बरसे  लाशों से पटी पड़ी भूमि और अधर्म का संहार हुआ                                              © रोहित गुप्ता  

साक्षात्कार - युवा कवि राकेश तिवारी जी

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साक्षात्कार -  युवा कवि राकेश तिवारी जी  , दर्शन राज पुरोहित जी और शुभम श्याम जी मैं  VOX POPULI, IIT Kanpur  की तरफ से रोहित गुप्ता और हमारे साथ हैं और,  हमारे साथ हैं एक नए युवा कवि राकेश तिवारी जी   , दर्शन राज पुरोहित जी और शुभम श्याम जी । तो सवालों और जवाबों का दौर शुरू करते हैं। रोहित गुप्ता : आपके लेखन का सफर आपके  जीवन में कहाँ से शुरू हुआ ? राकेश तिवारी : लिखने का सफर कॉलेज से शुरू हुआ , , जैसे Pure Emotions  जो Expression के होते हैं वो वहीँ से मिलते हैं  कवी को उसका आइना बता देता है की उसके पास क्या अलग है, मैंने देखा की मैं बातों बातों में तुकबंदी बना लेता था।  तो फिर मैंने कविता लिखना शुरू कर दिया।  उस समय मेरा नाम Rhyming तिवारी पड़ गया था।  शुभम श्याम :   मैंने नवमी क्लास में था हमारे बिहार में हिंदी या संस्कृत में से कोई एक चुनना होता था , मैंने संस्कृत चुना था ,फिर जब हमारे पिताजी को पता चला तो बोले  "तुम्हें पूजा करना है क्या ? जो संस्कृत पढ़...

साक्षात्कार - पद्म श्री , श्री लीलाधर जगूड़ी जी

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साक्षात्कार - पद्म श्री , श्री लीलाधर जगूड़ी जी मैं  VOX POPULI, IIT Kanpur  की तरफ से रोहित गुप्ता और हमारे साथ हैं एक कवि , लेखक , नाटककार पद्म श्री से सम्मानित  श्री लीलाधर जगूड़ी जी । तो सवालों और जवाबों का दौर शुरू करते हैं। रोहित :-      आपको कविता लिखने की प्रेरणा कैसे मिली , कबसे शुरू की, और क्यों शुरू किया? लीलाधर जी :-   कोर्स बुक की कविताओं ने मुझे बहुत प्रभावित किया , हमारे समय में सोहनलाल दुवेदी जी जो बाल कविता भी लिखते थे , और अच्छे कवियों की कवितायें बचपन में पड़ने को मिली। आज कल वैसी कवितायेँ किताबों में नहीं आती।और  मेरे पिता जी संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उनसे मुझे बहुत सारी चीजें बचपन में सुनने को मिलती थी, जब वो कहानी के रूप में काव्य का विश्लेषण करते थे खास करके रामचरित मानस का , और वो शब्दों की गरिमा का भी ख्याल रखते थे। फिर मुझे भी लगा कि मैं भी ऐसा कर सकता हूँ, तो यहाँ से मेरी कविता की शुरुआत हुई।  पहले तो ...

तिरस्कार

तिरस्कार (भाग - 4)  मैं ट्रेन में बैठा हुआ खिड़की के बाहर देख रहा था, सुबह का समय था। मेरे चेहरे पर एक अलग ही खुशी थी क्योंकि दूर से दिखाई पड़ने वाली शहर की ऊंची ऊंची इमारतों से तो मालूम हो रहा था कि मैं अपनी मंजिल की तक पहुंचने वाला हूँ। धीरे-धीरे ट्रेन भी धीमी हो रही थी, अलग-अलग दिशा से आती हुई कई सारी पटरियां आपस में मानो गले मिल रही थी। और जैसे ही उन पटरियों को मेरी नजर ने पार किया तो दिखाई दी घनी कच्ची बस्तियां उन बस्तियों के बीच से निकलते हुए गंदे नाले, और उन पटरियों पर प्लास्टिक बटोरते हुए फाटे हाल बच्चे, शायद इस आस में कि शायद शाम को कुछ खाने को मिल जाये। और इसी बीच सुनाई दी फिर वही सिक्कों खनक । इस बार किसी बच्ची की बजाए, चाय वाला खड़ा था। प्लेटफॉर्म आ चुका था।  “चाय्य्य…… सामोसैय्य…” की आवाज तेज होती जा रही थी। मैंने जल्दी से सामान उठाया और गेट पर पहुंच गया, ट्रेन रुकी और लोगों की ठेलमठेल में मैं अपने आप बाहर निकल गया। पहले तो थोड़ा चला , पर फिर लगा कि जब पता ही नहीं जाना कहाँ है, तो मैं जा कहां रहा हूँ। अकेला था, तो मस्तमौला हो कर रास्ता खोजते हुए निकल पड़ा। ...