जिंदगी बेशर्म क्यों है?
जिंदगी
बेशर्म क्यों है?
ये हवा के झोंके,
दिल दहलाते क्यों नहीं?
डराती क्यों नहीं
,
पंखों कि आवाज हमें?
क्यों नहीं होते,
उन अफ़वाहों को सुन,
चौकन्ने?
चहुं ओर मायूसी है,
फिर भी चेहरे मुस्कुराते क्यों हैं?
जो अंदर है,
वो बाहर दिखता क्यों नही?
लोग कहते हैं -
पर चुल्लू भर पानी कहां,
जो डुबा ले हमें !
शायद कुछ अलग है,
लोग समझते हमें कुछ अलग हैं।
क्योंकि जो हम हैं,
वो किसी को दिखाते नहीं।
इसलिये, जिंदगी बेशर्म है।
© रोहित गुप्ता
