साक्षात्कार - युवा कवि राकेश तिवारी जी

साक्षात्कार - युवा कवि राकेश तिवारी जी  , दर्शन राज पुरोहित जी और शुभम श्याम जी




मैं VOX POPULI, IIT Kanpur की तरफ से रोहित गुप्ता और हमारे साथ हैं और,  हमारे साथ हैं एक नए
युवा कवि राकेश तिवारी जी  , दर्शन राज पुरोहित जी और शुभम श्याम जी। तो सवालों और जवाबों का दौर शुरू करते हैं।



रोहित गुप्ता : आपके लेखन का सफर आपके  जीवन में कहाँ से शुरू हुआ ?

राकेश तिवारी : लिखने का सफर कॉलेज से शुरू हुआ , , जैसे Pure Emotions  जो Expression के होते हैं वो वहीँ से मिलते हैं  कवी को उसका आइना बता देता है की उसके पास क्या अलग है, मैंने देखा की मैं बातों बातों में तुकबंदी बना लेता था।  तो फिर मैंने कविता लिखना शुरू कर दिया।  उस समय मेरा नाम Rhyming तिवारी पड़ गया था। 

शुभम श्याम :  मैंने नवमी क्लास में था हमारे बिहार में हिंदी या संस्कृत में से कोई एक चुनना होता था , मैंने संस्कृत चुना था ,फिर जब हमारे पिताजी को पता चला तो बोले  "तुम्हें पूजा करना है क्या ? जो संस्कृत पढ़  रहे हो।"  और वहां से मुझे हिंदी लेना पड़ा।  और फिर मेरी हिंदी की मैडम ने  मुझे  दिनकर, महादेवी वर्मा की किताबों को उसी समय थमाया था और कहा था की हर कविता से एक एक पंक्ति उठा कर अपनी कविता लिखो। वही से मेरी कविता की शुरुआत हुई। 

दर्शन :  मैं बड़ा दुखी सा था। फिर पता नहीं क्या हुआ मैंने नोटबुक का आखिरी पन्ना खोला और लिखा "क्यों नहीं" ,  फिर लिखता चला गया , उसके बाद बंद कर दी ,फिर मेरी इंजीनियरिंग  ख़त्म हो गयी।  रूम खाली कर रहा था।  मेरे दोस्त के पास वो नोटबुक पहुँच गयी।  उसने उसे पड़ा और बोला की ये कौन सा गाना है मैंने कहा कोई गाना -वान नहीं है, मैंने लिखा है वो।  नहीं माना तो उसे बताने के लिए, मैंने एक और लिखा।  तब मुझे पता  चला कि मैं लिख सकता हूँ।  फिर मैंने पहले इंग्लिश में लिखना शुरू किया, फिर हिंदी में आ गया। क्योंकि उसमें भाव अच्छे आते हैं। 

रोहित गुप्ता : आपने लिखा था
"एक कभी न भूलने वाले एहसास होती हैं,
कुछ मेंहफ़िलें हमेशा खास होती हैं।
IIT का बुलावा हमेशा खास होता है, क्योंकी जहाँ JEE को पार कर पुहंच नहीं पाए,वहाँ आपकी लिखी कवितायें आपको ले जाती हैं। "
तो आप IITians और IIT के कवियों को किस नजर से देखते हैं?

राकेश तिवारी :  मैं IITians को बड़े सम्मान की नजर से देखता हूँ।  मैं IIT में नहीं निकल पाया , जब हम लोग आठमी और नवमीं में नार्मल किताबें पड़ के खुश हो जाते थे।  तब वो लोग एच. सी. वर्मा पड़ते थे।  इतने असाइनमेंट और ग्रेड्स के पीछे भागने के बाद भी अगर यहाँ कलाकार  और कवि  हैं, तो मुझे लगता है वो मेरे लिए सम्माननीय है।  मेरे लिए आपके बीच कविता पड़ना ही सम्माननीय है। 

रोहित गुप्ता : कवि सम्मेलन में सुनाने वाली कविता , डायरी में लिखने वाली कविता से कितनी अलग होती है ?

राकेश तिवारी :  कवि सम्मलेन ऑडियंस पर निर्भर करता है।  उसमें मैं अपनी मिसिंग , शमशान जैसी कवितायेँ नहीं पड़ सकता हूं।  उसमें मनोरंजन डालना होता है , भले ही आपका उस जॉनर के न हो।  सम्मलेन की कविता हमेश तालियों के लिए ज्यादा होती है। ये श्रोता प्रधान होती हैं।  आपके पास कविसम्मेलन वाला सामान होना चाहिए और उसे सुनाते-सुनाते बीच में एक गुलकंद रखना पड़ेगा। 


शुभम श्याम  : मुनव्वर राणा जी ने कहा था कि, कोई अगर अपना २-३ घंटे आपको दे रहा है, तो आपको उन्हें मनोरंजन देना, आपकी जिम्मेदारी बन जाती है।  आपकी कोशिश होनी चाहिए कि आप उनके समझ के हिसाब से कविता पड़ें। फिर धीरे धीरे अपने साथ बड़ा कीजिये, ऐसे साहित्य बड़ा होता है। क्योंकि डायरी की कविता से ज्यादा कविसम्मेलन की कविता लोगों तक ज्यादा पहुँचती है।  


रोहित गुप्ता : अवसरवादी होना किस हद तक सही है ?
राकेश तिवारी : कवि बोल सकता है, इसलिए लोग आपकी नैतिक जिम्मेदारी समझते  है कि, जो समाज में जो चल रहा है उस पर आप लिखिए।  जैसे नोटेबंदी हुई, कवि ने कुछ क्यों नहीं लिखा ,आपकी इस पर क्या राय है। आपको अवसरबादी होना चाहिए। 

शुभम श्याम :  कलाकार को कभी बांधना नहीं चाहिए। अवसरवादिता उसे फ्लेक्सिबल बनाती  है। 


रोहित गुप्ता : कविता को सामानांतर करियर की तरह देखना कितना सही है ?

दर्शन :  अगर मैं सिर्फ कविता लिखुंगा तो एक ऐसा समय आ जायेगा कि उसके बाद मैं कुछ लिख नहीं सकता। सामानांतर करियर बहुत अच्छा है।

राकेश तिवारी :  कविता आपका घर नहीं चला सकती। जाकिर जी कहते हैं  जब तक आपका शौक आपका राशन नहीं चला रहा , तब तक ऐसा कोई शौक नहीं  है जो आप अपने काम के साथ नहीं चला सकते।   अगर आप सिर्फ कविता लिखेंगे , तो आपको सोचना पड़ेगा कि आज चार कविता नहीं लिखी तो मेरा घर नहीं चलेगा। इससे कविता की क्वालिटी गिर जाती है।


रोहित गुप्ता : आप हमारे उभरते हुए कवियों के लिए कुछ कहें ?

राकेश तिवारी  : 
दिल में जख्म ताजा मत रखना, तुममें हुनर है तो तालियां सुनाई देंगी कभी , 
कभी किसी भीड़ से अपने हुनर का, अंदाजा मत रखना 
आपको कई बार सुनने के लिए लोग नहीं मिलेंगे 


रोहित गुप्ता : आपको आई आई टी कानपूर में कैसा लगा 

राकेश तिवारी  : मुझे पागलपन लगा।  आपका आथित्य बहुत अच्छा था।  और श्रोताओं का हुजूम भी  बहुत अच्छा था।  मुझे कहीं नहीं लगा की हम बड़े कलाकार नहीं हैं। 
IIT एक भाव नहीं एक जीत की तरह है , इस जीत से हमें मिलाते रहिये 
 पैसे तो हम कम ज्यादा समझ लेंगे, बस हमें  ही बुलाते  रहिये 

धन्यबाद।