तिरस्कार

तिरस्कार (भाग - 4)

 मैं ट्रेन में बैठा हुआ खिड़की के बाहर देख रहा था, सुबह का समय था। मेरे चेहरे पर एक अलग ही खुशी थी क्योंकि दूर से दिखाई पड़ने वाली शहर की ऊंची ऊंची इमारतों से तो मालूम हो रहा था कि मैं अपनी मंजिल की तक पहुंचने वाला हूँ।



धीरे-धीरे ट्रेन भी धीमी हो रही थी, अलग-अलग दिशा से आती हुई कई सारी पटरियां आपस में मानो गले मिल रही थी। और जैसे ही उन पटरियों को मेरी नजर ने पार किया तो दिखाई दी घनी कच्ची बस्तियां उन बस्तियों के बीच से निकलते हुए गंदे नाले, और उन पटरियों पर प्लास्टिक बटोरते हुए फाटे हाल बच्चे, शायद इस आस में कि शायद शाम को कुछ खाने को मिल जाये। और इसी बीच सुनाई दी फिर वही सिक्कों खनक । इस बार किसी बच्ची की बजाए, चाय वाला खड़ा था। प्लेटफॉर्म आ चुका था।  “चाय्य्य…… सामोसैय्य…” की आवाज तेज होती जा रही थी। मैंने जल्दी से सामान उठाया और गेट पर पहुंच गया, ट्रेन रुकी और लोगों की ठेलमठेल में मैं अपने आप बाहर निकल गया। पहले तो थोड़ा चला , पर फिर लगा कि जब पता ही नहीं जाना कहाँ है, तो मैं जा कहां रहा हूँ। अकेला था, तो मस्तमौला हो कर रास्ता खोजते हुए निकल पड़ा।



 ये जितना ऊंची इमारत वालों का शहर है उतना ही कच्ची घनी बस्ती वालों का। यहां  सब को या तो फुटपाथ का सहारा है या फिर स्टेशन का । कोई इस पर भागते हुए जिंदगी काटता है, तो कोई यहां सो कर रात काटता है।

मैं स्टेशन से बाहर निकलने का रास्ता खोजते हुए हॉल में पहुँचा। और वहां मुझे भोंकते हुए कुत्ते की आवाज सुनाई दी। मेरा मस्तमौला पन अब दर में बदल चुका था। मुझे कुत्तों से डर जो लगता था। मैं उस ओर मुड़ा और घटित हो रहे माहौल को समझने की कोशिश की। तो देखा एक खाने की दुकान पर एक महिला कुछ खरीद रही थी , और एक कुत्ता और फटेहाल आदमी दोनों उससे गुहार लगा रहे थे, खैर इस संसार में हर प्राणी को भूख लगती है। परंतु यहां कुत्ता उस फटेहाल पर हावी था, और उस पर भोंक रहा था। उस कुत्ते को भी अपना प्रतिद्वंद्वी दिखाई दे रहा था। परंतु जहां इंसानों ने पूरे संसार पर अपना आधिपत्य जमाया हुआ हो, वहां एक कुत्ता इंसान पर हावी हो जाये। और वह भी वहां जहां कुत्तों के होने पर प्रतिबंध हो। वहीं आदमी भी सोच रहा था कि क्या चुने, मिलने वाला खाना या उस कुत्ते का डर । वह कुत्ते को कुछ बोल कर शांत करने की कोशिश करता। पर जिस कुत्ते को लग रहा हो कि कहीं, वो उसका हिस्सा न ले ले , वो कहाँ शांत होगा?

और फिर मेरी मुलाकात अमीरी और गरीबी के दो पहलुओं से हुई । वहां खड़ी महिला ने फटेहाल आदमी को वहां खड़े होने के लिए फटकार लगाई और उसे स्टेशन से बाहर निकलवा दिया। मैं यह सब बस सा स्तब्ध खड़ा देखता रह गया। यहां मैं एक कुत्ते की अमीरी को जीतते हुए देख रहा था, और एक इंसान को समाज के एक टुकड़े से तिरस्कृत होते हुए।


© रोहित गुप्ता