शायद अभी कुछ बाकी है
शायद अभी कुछ बाकी है
देखा होगा कभी तुमने,
ढलते हुए अस्ताचल अतल में।
सोचा होगा,हर दिन की तरह तू ढल जायेगा।
तम घना चतुर्दिश छायेगा।
पर हल्का ही सही, परावर्तित ही कहीं,
प्रकाश आस अभी बाकी है।
कभी संगीत सुना होगा।
मन भी तान पर थिरका होगा।
सोचा होगा, यह तान भी मद्धिम हो जाएगी।
यह नाम भी गुमनामी में खो जायेगा।
पर कम्पित हो सकते हैं तार तार।
उन्माद राग अभी बाकी है।
कभी पतझर में वृक्ष देखा होगा।
निर्जन, निर्मम, संशून्य सा पाया होगा।
सोचा होगा,कोपलें पल्लवित न होंगी।
तरु गिर कर भी उठ न पायेगा।
पर दे सकता है छाया सघन निजछत्र तले
वसंत श्रृंगार अभी बाकी है।
तरु गिर कर भी उठ न पायेगा।
पर दे सकता है छाया सघन निजछत्र तले
वसंत श्रृंगार अभी बाकी है।
कभी उठते ज्वार को देखा होगा।
ख्याल मन को झकझोरने का आया होगा।
सोचा होगा कमजोर है निज गुरुत्वबल।
जाग्रत मनो ज्वार न हो पायेगा।
पर ज्वार को उठाना पडेगा।
पर ज्वार को उठाना पडेगा।
तुझमें अभी कुछ बाकी है।
© रोहित गुप्ता
