कृष्ण
ग्वालन के संग गैंया चरायो, गोपी संग रास रचायो रे
मटकी फोड़ माखन चुरायो , नाग पे नाच दिखायो रे
हे गिरिधर नागर जिस गिरी को छत्र बनायो
मैं भी उस गोवर्धन नीचे आनंदमयी हो जायूँ रे
वृंत कदम्ब सी छाया, शांत सा मधुबन
मोरपखा कान्हा की बंसी सुरीली
गोपियाँ राधा संग-संग रास रचाये
मानो पाया हो प्रेम, जिसे उद्धव न पाए
मधुसूदन ने गीता पाठ किया, धर्म कर्म बखान किया
विकराल रूप दिखा प्रभु ने, जैसे ही शंख नाद किया
मानो पल-पल में प्रलय हुआ , धरती फटी अंगारे बरसे
लाशों से पटी पड़ी भूमि और अधर्म का संहार हुआ
© रोहित गुप्ता


