साक्षात्कार - पद्म श्री , श्री लीलाधर जगूड़ी जी
साक्षात्कार - पद्म श्री , श्री लीलाधर जगूड़ी जी
मैं VOX POPULI, IIT Kanpur की तरफ से रोहित गुप्ता और हमारे साथ हैं एक कवि , लेखक , नाटककार पद्म श्री से सम्मानित श्री लीलाधर जगूड़ी जी। तो सवालों और जवाबों का दौर शुरू करते हैं।
रोहित :- आपको कविता लिखने की प्रेरणा कैसे मिली , कबसे शुरू की, और क्यों शुरू किया?
लीलाधर जी :- कोर्स बुक की कविताओं ने मुझे बहुत प्रभावित किया , हमारे समय में सोहनलाल दुवेदी जी जो बाल कविता भी लिखते थे , और अच्छे कवियों की कवितायें बचपन में पड़ने को मिली। आज कल वैसी कवितायेँ किताबों में नहीं आती।और मेरे पिता जी संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उनसे मुझे बहुत सारी चीजें बचपन में सुनने को मिलती थी, जब वो कहानी के रूप में काव्य का विश्लेषण करते थे खास करके रामचरित मानस का , और वो शब्दों की गरिमा का भी ख्याल रखते थे। फिर मुझे भी लगा कि मैं भी ऐसा कर सकता हूँ, तो यहाँ से मेरी कविता की शुरुआत हुई। पहले तो मैं लिख के रख लेता था, फिर मैंने सुनाना शुरू किया, मैं गाता भी अचछा था तो गाने लगा। फिर उसके बाद मैं ये समझा की गायन शब्द में होना चाहिए गले में नहीं। शब्द ऐसे हों की उनमें संगीत सुनाई दे। गीत गोविन्द के रचयिता श्रील जयदेव गोस्वामी जी ने लिखा है कि
" ललित लवंग लता परिशीलन, कोमल मलय समीरे ", इसमें अपने आप संगीत झलक रहा है, आज के ओर्केस्ट्रा के संगीत ने शब्द संगीत को समझने की कला नष्ट कर दी। आर्केस्ट्रा इसलिए हमें समझ में आता है क्योंकि इसमें माधुर्य है, मिठास है। यह भी कठिन है , इसमें भी तपस्या, साधना की जरुरत है। परन्तु काव्य संगीत उससे अलग है, आप काव्य का संगीत कितना समझते हैं यह विवादस्पद है।
रोहित :- कला और संस्कृति की तरफ से आज का युवा दूर जा रहा है। आप इसमें क्या कहना चाहेंगे ?
लीलाधर जी :- संस्कृति शब्द आज खतरे में है , लोग इसे खतरनाक बना देना चाहते हैं। लोग कहते हैं कि , जैसे महाराष्ट्र ,तमिल, असम, गढ़वाल इन सबकी संस्कृति अलग है। तो पूछता हूँ कि भारत की संस्कृति क्या है। लोग इन छोटो छोटी संस्कृतियों की वकालत भारतीय संस्कृतियो के नाम पर करते हैं। हम लोगों ने रीति-रिवाजों, खान-पान रहन-सहन को संस्कृति बना लिया है। संस्कृति का अभिप्राय है, जीवन पद्धति के लिए आंतरिक विश्वाश। और बाह्य विश्वाश का नाम सभ्यता है। संसार का मतलब है सरीसृप की तरह धीरे धीरे सरकने वाला। जो ये परिवर्तन है इसका धीरे धीरे चलना, और इसी परिवर्तन से ही ऊर्जा प्राप्त होती है। आपको इसके किये अपनी गति को बदलना पड़ेगा, अपने दिमाग बदलना पड़ेगा। और यह बदलाव एक कला है, यह एक विज्ञान है। जब कला और विज्ञान एक हो जायेगा , तो मनुष्य कला को नहीं छोड़ सकता है। और विज्ञान को भी कला की जरुरत है आकृति देने के लिए। मुझे नहीं लगता की आज हम कला से दूर जा रहे हैं। मनुष्य कला से दूर हो रहा है ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि हम उस नजर से नहीं देखते। बुराइयों में भी एक कला है , जैसे एक चोर की चोरी करने की कला।
रोहित :- आज का मानव प्रकृति का दोहन कर रहा है, तो प्रकृति के वकील होने के नाते, आप इस बारे में क्या कहेंगे ?
लीलाधर जी :- प्रकृति का सम्बन्ध मनुष्य से आदिकाल से रहा है। मैं मानता हूँ की वृक्ष हमें बहुत कुछ देते हैं। परन्तु मेरा एक सवाल है कि जब पृथ्वी का निर्माण हो रहा था. तब पृथ्वी पर वनष्पति नहीं थी, मानव नहीं था , पानी नहीं था , तो उस समय बारिश होना , पानी बनना , उसका जमीदोज होना, ये सब किसने किया होगा। मतलब पानी का उद्गम मात्र वृक्ष से ही नहीं है , और भी कारण हो सकते हैं, पर हमने उस पर गौर नहीं क्या। हम सूर्य की पूजा क्यों करते हैं क्योंकि वो हमें दिन और अन्धकार का अनुभव कराते हैं।
हम हमेशा कहते रहे "ज्योतिर्गमय" , उजाले की तरफ जाओ , हमने कभी अन्धकार का मतलब ही नहीं समझा। अंधकार की भी हमें जरुरत है, सोने के लिए। अभी मनुष्य प्रकृति को समझ नहीं पाया है।
रोहित :- रचना का लोकप्रियता से क्या सम्बन्ध है? और उसका क्या कला को क्या नुकसान है ?
लीलाधर जी :- लोकप्रियता दो प्रकार की है एक तो अभ्यासजन्य , इसके लिए अभ्यास करना पड़ता है। जैसे कभी भी कम्पनियाँ भूख को नहीं उकसाती। भूख पेट के खली होने से लगती है। कम्पनियाँ बस ये जानती हैं की ये चीज चलेंगी या नहीं। ऐसा रचना का है।
लोकप्रियता अकसर इस बात से पैदा होती है कि लोग आपको जाने या सब तक आप पहुंचे। लेकिन कभी कभी कोई चीज बहुत मूल्यबान होती है पर वह लोकप्रिय नहीं होती , जैसे जल और हीरा। और कभी -कभी घटिया चीज भी लोकप्रिय हो जाती है। गंभीर साहित्य बहुत कम लोकप्रिय होता है। हमें कुछ ऐसी जरुरत है कि ऐसी कला और बढ़ावा मिले।
रोहित :- आप बहुमुखी प्रतिभा का होना अथवा एक ही विधा में पारंगत होना, इसके बारे में आपके क्या ख्याल है ?
लीलाधर जी :- यह दो नाव में पैर रख के सवारी करने की तरह है , नाव तो डगमगाएगी। तो अगर आप एक ही विधा में काम करेंगे तो आप बहुत अच्छा कर सकते हैं। परन्तु मैं यह भी नहीं कह रहा कि दोनों नाव में पैर रख कर सवारी करना गलत है। अगर आप यह कर सकते हैं तो करिये। और दोनों में अच्छा करते हैं यह तो बहुत ही अच्छी बात है यह भी एक कला है।
रोहित :- कवि को ब्रह्मा की उपाधि दी जाती है, तो इस पर आप क्या कहना चाहेंगे ?
लीलाधर जी :- ब्रह्मा सृष्टि का रचयिता है। और ब्रह्मा विष्णु की नाभि से निकले हुए कमल से पैदा हुए। इस अवधारणा में पुरुष से पुरुष कैसे पैदा हो सकता है, बिना स्त्री के। तो कमल का फूल विष्णु का चिंतन हो सकता है। और उसके ऊपर जो विचार रूपी सुगंध, सौंदर्य है , वह ब्रह्मा है। और उस ब्रह्मा के हुए भौंरे सृष्टि है। वहां से रचना होती है। बृह्मा आपकी चेतना है , आपका स्वाध्याय है।
" स्वाध्याय तपः " स्वाध्याय एक तप है ।
" कवि मनीषी परिभू स्वयंभू " कवि अपने मन का ईश्वर है और अपने आस पास की चेतना रखना और स्वयं की चेतना रखना ही कवी है।
भरत मुनि ने भी कहा है कि " शब्दस छंदः " शब्द ही छंद है। तुकबंदी छंद नहीं है।
परन्तु कविता शब्दों का पुंज भी नहीं है। कविता में काव्य तत्त्व होना चाहिए।
जैसे शमशेर बहादुर जी की कविता है।
" स्वाध्याय तपः " स्वाध्याय एक तप है ।
" कवि मनीषी परिभू स्वयंभू " कवि अपने मन का ईश्वर है और अपने आस पास की चेतना रखना और स्वयं की चेतना रखना ही कवी है।
भरत मुनि ने भी कहा है कि " शब्दस छंदः " शब्द ही छंद है। तुकबंदी छंद नहीं है।
परन्तु कविता शब्दों का पुंज भी नहीं है। कविता में काव्य तत्त्व होना चाहिए।
जैसे शमशेर बहादुर जी की कविता है।
बात बोलेगी हम नहीं ,
भेद खोलेगी बात ही।
यह एक गद्य की तरह है पर एक कविता है। इसको समझना कठिन है।
रोहित :- आप हमारे प्रतिभागियों के लिए क्या मार्गदर्शन देना चाहेंगे ?
लीलाधर जी :- मुझे खुशी हुई की इनका रुझान कला के प्रति भी है। ये कोशिशें जारी रहनी चाहिए।
पर मेरा एक सन्देश है की लिखने से ज्यादा जरूरी है पड़ना। क्योंकि नया वाक्य विन्यास लिखने के लिए, आपको पता हो की यह कभी नहीं लिखा गया है। इसके लिए पड़ना पड़ेगा। और इसलिए भी क्योंकि अंतःकरण का निर्माण बाहर से होता है, फिर अंदर की ऊर्जा बाहरी परिवेश को बदलती है।
पर मेरा एक सन्देश है की लिखने से ज्यादा जरूरी है पड़ना। क्योंकि नया वाक्य विन्यास लिखने के लिए, आपको पता हो की यह कभी नहीं लिखा गया है। इसके लिए पड़ना पड़ेगा। और इसलिए भी क्योंकि अंतःकरण का निर्माण बाहर से होता है, फिर अंदर की ऊर्जा बाहरी परिवेश को बदलती है।
शब्दों में कविता को परखना लोगों की ख़राब आदत है। लोगों को उन शब्दों की स्थापत्य कला को भी देखना चाहिए।
रोहित :- आपका आई आई टी कानपूर का अनुभव कैसा रहा ? और आपने यहाँ के छात्रों में क्या देखा ?
लीलाधर जी :- मुझे अच्छा लगा की यहाँ लोगों के अंदर कल्चरल की समझ धीमे धीमे आ रही है। यहाँ पर सबने अपनी अपनी खिड़की बना रखी है, सबके हिस्से में खिड़की आनी चाहिए। पर एक ऐसा गोल दरवाजा भी होना चाहिए, जो खिड़कियों से बड़ा हो और जिसमें से ज्यादा बड़ा दृश्य दिखता हो। छात्रों के बीच मुझे ये चेतना नजर आयी की वो एक बड़ा दरवाजा बनाना चाहते है। बस इतना ही।
धन्यबाद