एक पिता
सुना आज मैंने ,
रोते हुए दरवाजे को,
लगा जैसे
जख्म किसी ने कुरेद डाले हों
मानो छू दिया हो
नादान हवा के रुख ने
रोते हुए दरवाजे को,
लगा जैसे
जख्म किसी ने कुरेद डाले हों
मानो छू दिया हो
नादान हवा के रुख ने
और निकल गयी हो आह
जो संजोये हुए है
पुरखों की विरासत
उनकी नेमत बेटों को सोंपने
आज भी तूफानों से लड़ने
खड़ा रहता है संरक्षक की तरह
आपने भी देखा होगा
जब उँगली दिखाकर सम्मान से,
जब उँगली दिखाकर सम्मान से,
लोग पुकारते होंगे
उसके पुरखों के नाम
जब सुनता होगा स्वर
किन्नरों के तालों से निकले हुए
तो शायद तब खुश होता होगा
आज हर अतिथि के सम्मान में खड़ा है
शायद कोई आये और दुःख उसका सुन ले
अकेली थी ये रोने की आवाज
घर सूना था
शायद यह एक पिता था
© रोहित गुप्ता
