उड़ान
उड़ान
तट किनारे लगा जैसे,
मुझे अतीत बुला रहा हो,
खींच रहा हो ऊँगली पकड़ कर,
कुछ दिखाने को, खेलने को,
या चलना सीखने को,
जिंदगी से समुद्र तट पर,
राह बताने को।
उसके भागते भागते
छोटे-छोटे चंचल पैर,
जो मनःसमृति पर छप चुके हैं,
रेत पर अपनी छाप नहीं छोड़ पा रहे,
लहरें मिटा रही हैं बार बार उनको।
उन नर्म हथेली की लकीरों को जरुरत है,
चाह है साबुन के उस बुलबुले को पाने की,
जो हवा में हर पल उससे दूर होता जा रहा है।
जब उसने उछलना सीखा,
तो जैसे रुई सा रूपित हो ,
स्वच्छंद आसमां में भांति-भांति,
एक युगल सा अठखेलियां करता,
बस इसी आसमां तले,
सबका अकथ संसार है।
© रोहित गुप्ता

