सिक्कों की खनक
सिक्कों की खनक (भाग :- 3)
ट्रेन अपनी रफ़्तार में बीहड़ों को पार करती हुई चली जा रही थी , और मैं लोगों और समाज के व्यवहार के बारे सोच रहा था कि इतने में मुझे कुछ सिक्कों की खनक ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा , मैं उस ओर मुड़ा तो देखता हूँ कि एक बच्ची हाथों में कुछ सिक्कों को लिए , कुछ और सिक्कों की दरकार कर रही थी। मैंने हिसाब लगाया की करीब करीब दिन के २०० लोगों ने भी एक - एक रूपया भी दिया तो इसकी तो अच्छी कमाई हो गयी। और फिर हाथ हिलाते हुए , उसे मैंने उसे मना कर दिया।
ट्रैन को सिग्नल न मिलने के कारण कुछ दूर जा कर रुक गयी।
"ट्रैन पहले से ही लेट चल रही थी , और अब ये रेलवे वाले भी , जब संभाल नहीं सकते तो इतनी ट्रेनें चलाते ही क्यों है" तपाक से मेरे मुँह से निकला।
दूर - दूर तक कुछ नजर नहीं आ रहा था। गर्मी काफी तेज , और अब तो प्यास भी लगने लगी थी। इन बीहड़ों में कौन था पानी की पूछने वाला। फिर दूर से कही कई सारे बच्चे आये जिनके हाथों में पानी की थैलियां थीं। वो चिल्ला रहे थे “एक रुपये में एक। , एक रुपये में एक। ” ,
मैं उन्हें देखते हुए सोच रहा था कि “ पता नहीं कहाँ से, कैसा पानी लाये हैं, बीमार हो गए तो क्या होगा”
परन्तु पानी तो चाहिए था , अब आगे मिले न मिले , चलो अच्छा एक ले ही लेते हैं।
मैंने आवाज दी "एक दो", उसकी ओर एक रुपये बढ़ाते हुए।
उसने एक पानी की थैली मेरी ओर बड़ा दी।
मैंने पुछा “ कहाँ से लाते हो ”,
तो उसने सूखे होठों से थूक गटकते हुए बोला “ साहब गाँव से लाये हैं ” ,
मैं सोच रहा था की यहां दूर दूर तक तो कोई गाओं दिख नहीं रहा , “कितनी दूर है तुम्हारा गाँव”
तो बोला “ यही थोड़ी दूर करीब दो किलो मीटर होगा “, मैं उसकी प्यास से भरी जवान को देख रहा था। सोच रहा था , उसे खुद को पानी की जरुरत है और वो दूसरों को पानी पिला रहा है।
ट्रैन चलने लगी थी मैं पानी पी कर स्वयं को तृप्त कर रहा था , और देखता हूँ कि वो बच्चे अपनी हथेली पर सिक्के गिन रहे थे आठ, नौ, दस , ग्यारह ,… ग्यारह बोलते ही उसके चचेरे पर एक ख़ुशी थी , लग रहा रहा कि शायद ये कई दिनों बाद दस के पार गये थे। बारह , तेरह ,…. जैसे जैसे उनकी गिनती बढ़ती जा रही थी उसकी खुसी भी बढ़ती जा रही थी।
मेरे सामने उस बच्ची का चेहरा भी रूबरू हो गया जिसे मैंने एक सिक्का भी देने से मना कर दिया था। उसकी आँखों में नमी थी , हलकी बेचारगी थी। मैं सोच रहा था कि ये बच्चे नहीं जानते वो जिस उम्र में पानी बेच रहे है वो उनके लिए कितनी कीमती है ,वो इस गर्मी में बीमार भी हो सकते है। वो तो बस यही जानते थे कि एक सिक्के की कीमत क्या होती है। ये उनके खेलने की उम्र थी | और वो क्या कर रहे थे। उन्हें बस एक सिक्के की कीमत पता थी | जो कि हम लोग नहीं जानते थे। उनके लिए यही एक ज्ञान था, यही वो खेलना। उन्हें नहीं पता था की जिस उम्र में उन्हें पड़ना चाहिए , उस उम्र में वो अपनी मजबूरी और पेट के खातिर इतनी बड़ी कीमत अदा रही थी , मात्र कुछ सिक्कों के लिए।
इतनी ही देर में एक किन्नर आया। जिसके हाथ पैर सही सलामत थे , अच्छी खासी उम्र , कहीं से नहीं लग रहा था की उसे रुपये माँगने की जरुरत है। फिर भी सब से जोर जबरदस्ती करते हुए दस दस रुपये ले रहा था। कोई उसे सिक्के भी थमाता तो बापस कर देता और खरी खोटी भी सुनाता। उसे सिक्कों की खनक से कोई मतलब नहीं था। जहां लोग एक सिक्का भी नहीं दे रहे थे , आज दस दस रुपये देने को तैयार थे।
पर फिर मेरे मन में एक बात कौंध उठी, कि जो किन्नर लोगों से जबरदस्ती पैसे ले रहा था। क्या उसका इस तरह जबरदस्ती पैसे ले जाना गलत था? आज वो भले ही लोगों से मांगकर या खरी खोटी सुना कर पैसे मांगता हो पर क्या इसमें उस समाज का कोई कसूर नहीं था? वो भी नहीं चाहता होगा कि वह मांगे , पर जिसे समाज ने पैदा होते ही तिरस्कार की नजरों से देखा हो मजाक बनाया होगा। इस समाज के उलाहनों ने उसे इतना कठोर बना दिया कि अब उसकी नजरों में यह समाज सिर्फ खरी खोटी सुनने के लायक ही बचा हो।
यह समाज हमेशा की तरह अपने कमजोर गरीब, स्त्री ,किन्नर , फटेहाल को तिरस्कृत करता रहा है। ताकि उसका प्रभुत्व कभी खत्म न हो। और ये उनके सामने ऐसे ही सिक्के खनखनाते रहें।
"ट्रैन पहले से ही लेट चल रही थी , और अब ये रेलवे वाले भी , जब संभाल नहीं सकते तो इतनी ट्रेनें चलाते ही क्यों है" तपाक से मेरे मुँह से निकला।
दूर - दूर तक कुछ नजर नहीं आ रहा था। गर्मी काफी तेज , और अब तो प्यास भी लगने लगी थी। इन बीहड़ों में कौन था पानी की पूछने वाला। फिर दूर से कही कई सारे बच्चे आये जिनके हाथों में पानी की थैलियां थीं। वो चिल्ला रहे थे “एक रुपये में एक। , एक रुपये में एक। ” ,
मैं उन्हें देखते हुए सोच रहा था कि “ पता नहीं कहाँ से, कैसा पानी लाये हैं, बीमार हो गए तो क्या होगा”
परन्तु पानी तो चाहिए था , अब आगे मिले न मिले , चलो अच्छा एक ले ही लेते हैं।
मैंने आवाज दी "एक दो", उसकी ओर एक रुपये बढ़ाते हुए।
उसने एक पानी की थैली मेरी ओर बड़ा दी।
मैंने पुछा “ कहाँ से लाते हो ”,
तो उसने सूखे होठों से थूक गटकते हुए बोला “ साहब गाँव से लाये हैं ” ,
मैं सोच रहा था की यहां दूर दूर तक तो कोई गाओं दिख नहीं रहा , “कितनी दूर है तुम्हारा गाँव”
तो बोला “ यही थोड़ी दूर करीब दो किलो मीटर होगा “, मैं उसकी प्यास से भरी जवान को देख रहा था। सोच रहा था , उसे खुद को पानी की जरुरत है और वो दूसरों को पानी पिला रहा है।
ट्रैन चलने लगी थी मैं पानी पी कर स्वयं को तृप्त कर रहा था , और देखता हूँ कि वो बच्चे अपनी हथेली पर सिक्के गिन रहे थे आठ, नौ, दस , ग्यारह ,… ग्यारह बोलते ही उसके चचेरे पर एक ख़ुशी थी , लग रहा रहा कि शायद ये कई दिनों बाद दस के पार गये थे। बारह , तेरह ,…. जैसे जैसे उनकी गिनती बढ़ती जा रही थी उसकी खुसी भी बढ़ती जा रही थी।
मेरे सामने उस बच्ची का चेहरा भी रूबरू हो गया जिसे मैंने एक सिक्का भी देने से मना कर दिया था। उसकी आँखों में नमी थी , हलकी बेचारगी थी। मैं सोच रहा था कि ये बच्चे नहीं जानते वो जिस उम्र में पानी बेच रहे है वो उनके लिए कितनी कीमती है ,वो इस गर्मी में बीमार भी हो सकते है। वो तो बस यही जानते थे कि एक सिक्के की कीमत क्या होती है। ये उनके खेलने की उम्र थी | और वो क्या कर रहे थे। उन्हें बस एक सिक्के की कीमत पता थी | जो कि हम लोग नहीं जानते थे। उनके लिए यही एक ज्ञान था, यही वो खेलना। उन्हें नहीं पता था की जिस उम्र में उन्हें पड़ना चाहिए , उस उम्र में वो अपनी मजबूरी और पेट के खातिर इतनी बड़ी कीमत अदा रही थी , मात्र कुछ सिक्कों के लिए।
इतनी ही देर में एक किन्नर आया। जिसके हाथ पैर सही सलामत थे , अच्छी खासी उम्र , कहीं से नहीं लग रहा था की उसे रुपये माँगने की जरुरत है। फिर भी सब से जोर जबरदस्ती करते हुए दस दस रुपये ले रहा था। कोई उसे सिक्के भी थमाता तो बापस कर देता और खरी खोटी भी सुनाता। उसे सिक्कों की खनक से कोई मतलब नहीं था। जहां लोग एक सिक्का भी नहीं दे रहे थे , आज दस दस रुपये देने को तैयार थे।
पर फिर मेरे मन में एक बात कौंध उठी, कि जो किन्नर लोगों से जबरदस्ती पैसे ले रहा था। क्या उसका इस तरह जबरदस्ती पैसे ले जाना गलत था? आज वो भले ही लोगों से मांगकर या खरी खोटी सुना कर पैसे मांगता हो पर क्या इसमें उस समाज का कोई कसूर नहीं था? वो भी नहीं चाहता होगा कि वह मांगे , पर जिसे समाज ने पैदा होते ही तिरस्कार की नजरों से देखा हो मजाक बनाया होगा। इस समाज के उलाहनों ने उसे इतना कठोर बना दिया कि अब उसकी नजरों में यह समाज सिर्फ खरी खोटी सुनने के लायक ही बचा हो।
यह समाज हमेशा की तरह अपने कमजोर गरीब, स्त्री ,किन्नर , फटेहाल को तिरस्कृत करता रहा है। ताकि उसका प्रभुत्व कभी खत्म न हो। और ये उनके सामने ऐसे ही सिक्के खनखनाते रहें।
- रोहित गुप्ता

