बड़ा होना
बड़ा होना (भाग :- 2)
मैं ट्रैन में बैठा हुआ बाहर प्लेटफार्म को पीछे जाते हुये
देख रहा था, सब कुछ समय के साथ पीछे गुजरता जा रहा था। फरबरी का महिना
था, खिडकी के बाहर की हवा मेरे बालों को संवारती हुई पीछे को जा
रही थी। उसकी सरसराहट और ठंडक मेरी कानों और आँखों को आराम दे रही थी। और उस गुजरते हुये
समय के साथ मैं सोच रहा था कि बड़ा होना
कितनी अलग जिम्मेदारी होती है, एक अलग ही अहसास
होता है, प्रेम होता है, समर्पण होता है।
बड़ा होना सिर्फ वही जान सकता है जो कभी बड़ा रहा हो। वो बड़े होते होते उन छोटों को क्या कुछ नहीं दे देते, और उसी में वो अधिक आनंद और खुशी प्राप्त कर लेते है, यही बड़े होने का अहसास है। ये अहसास स्वयं को सम्पूर्ण समर्पित करने को प्रेरित करता है। मानो माया से तो कोई लेना देना ही ना हो, और मोह हो तो बस अपने छोटों से।
काश कि ये अहसास, ये जिम्मेदारी छोटे समझ पाते, कि वो बड़ा जो सब कुछ उसके लिए समर्पित
कर चुका है वो बुरा
नहीं
है। और यह अहसास शायद इसलिये उन्हें नहीं
हो पाता,
क्योंकि उन छोटों
को होश ही नहीं होता जब वो बड़े अपना सब
कुछ
न्यौछावर
कर रहे होते हैं। उनहें
इतनी समझ नहीं होती कि वो ये समझ सकें कि उनके साथ क्या कुछ घट गया है
कभी-कभी तो छोटे बड़े होने के बाद भी नादानी
कर बैठते हैं, कैसा लगता होगा जब
उस नादानी को उसका बड़ा देखता
होगा। मानो कलेजा फट पडता होगा, उसने तो कभी ऐसा सोचा भी नहीं
होगा कि उसके साथ भी कुछ ऐसा हो सकता है। या तो अपने समर्पण
के लिये, या उसे माफ करने के लिये, उसकी आंखों
से आँसुओं का झरना फूट
पडता होगा। और
ये वही आंसुओं का झरना
होता है जो अकसर उस उम्र में निकलता है
जब
आदमी कई सालों से ना रोया हो।
- रोहित गुप्ता
