जल्दी – जल्दी
जल्दी – जल्दी (भाग :- 1)
आज मैं कुछ लेट हो गया था। कभी मेरी नज़र कलाई पर बंधी घड़ी पर होती, तो यातायात में फंसे होने के कारण लाल बत्ती पर। इंतजार था कि मैं जल्दी से रेलवे स्टेशन पहुंचूं और ट्रेन पकड़ूं।
ट्रेन बस अभी आई ही थी, और मैंने भी प्लेटफार्म पर कदम रखा ही था। मेरे पैर तेजी से ट्रेन की ओर बड़े चले जा रहे थे। तभी मैंने देखा कि एक अकेली नज़र, जो कि शायद अभी-अभी मुझ पर पड़ी होगी मुझे देख रही थी।
मेरे कदम हल्के हो गये थे। मुझे वो चेहरा जाना पहचाना सा लगा था। शायद हमने एक दूसरे को पहचान लिया था। पर आज हम एक दूसरे को पहचान कर भी ,पहचानने से इन्कार कर रहे थे। इसका मात्र यही कारण था, कि आज से पहले जब हम साथ थे। तब एक दूसरे को नहीं पहचान पाये थे।
उनकी भावनायें समझ, सोच, वह सब कुछ जो किसी व्यक्ति की जीवन भर की कमाई होती है, हमने जानने की कोशिश ही नहीं की थी। हमने भले ही बहुत वक्त साथ बिताया हो, परंतु स्वयं को कभी झुकने नहीं दिया और शायद इस दूरी का कारण भी यही था।
उस बात को बीते हुये एक अरसा हो गया था। हम आमने सामने थे। फिर भी आज मैने सोचा एक मुलाकात कर लें। परंतु मेरे हिम्मत जुटाने से पहले ट्रेन कि सीटी बजी और मैं उस वक्त की सीटी के साथ आगे बढ़ गया।
उस बात को बीते हुये एक अरसा हो गया था। हम आमने सामने थे। फिर भी आज मैने सोचा एक मुलाकात कर लें। परंतु मेरे हिम्मत जुटाने से पहले ट्रेन कि सीटी बजी और मैं उस वक्त की सीटी के साथ आगे बढ़ गया।
- रोहित गुप्ता
