चंद्रबिम्ब
चंद्रबिम्ब
कर रहा अंतर्मन सरोवर में विहार ,
देखता हूं चंद्रबिम्ब ,
जैसे पथिक ,प्रेमी रहे हों निहार ,
चंचलता ,सुन्दरता उस चंद्र की,
पथ ,प्रेमिका के समान ,
सोचा पा लूं उसे ,जल को छुआ ही था,
लगा जैसे चंद्र अमावस में खो गया हो ,
जल तरंग में ,मैं लक्ष्य को पा न सका ,
प्रयास फिर रहा असफल ,
जब फिर दिखा चंद्र ,चंद्रकलाओं सा
© रोहित गुप्ता
